• अपूर्ण प्रश्न और तो नहीं मुझे परन्तु चाह एक, जो सुनो, कहूँ विषाद, दुःख, कामना सभी। जो सुनो कहूँ अमोल अश्रुओं का घोर नाद, प्रेम में बही यहाँ अथाह प् […]

    अपूर्ण

    प्रश्न और तो नहीं मुझे परन्तु चाह एक, जो सुनो, कहूँ विषाद, दुःख, कामना सभी। जो सुनो कहूँ अमोल अश्रुओं का घोर नाद, प्रेम में बही यहाँ अथाह प्रीत की नदी।। चाह एक ही मुझे, कहूँ तुम्हें हृदै कि बात, वो, कहूँ अनन्य पीर,...

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    Kalamkash wrote a new post

    निर्झर यह कविता ‘निर्झर’ राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त जी की पुस्तक ‘मङ्गल-घट’ से ली गई है। शत-शत बाधा-बंधन तोड़,निकल चला मैं पत्थर फोड़।प्लावित कर […]

    निर्झर

    यह कविता 'निर्झर' राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त जी की पुस्तक 'मङ्गल-घट' से ली गई है। शत-शत बाधा-बंधन तोड़,निकल चला मैं पत्थर फोड़।प्लावित कर पृथ्वी के पर्त्त,समतल कर बहु गह्वर गर्त्त,दिखला कर आवर्त्त-विवर्त्त,आता हूँ आलोड़ विलोड़,निकल चला मैं पत्थर फोड़।पारावार-मिलन की...

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  • इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है, इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है। लहजे में एक जुस्तुजू, सीने में बेचैनी सी है, मेरा ग़म तो मेरा ह […]

    इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है

    इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है, इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है। लहजे में एक जुस्तुजू, सीने में बेचैनी सी है, मेरा ग़म तो मेरा है, तू क्यों महताब सिसकता है? इन कूचों में काम तिरा क्या,...

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    बे-साख्ता ऐसा कोई आलम, कोई ऐसा जहाँ होता कभी,  ना बंदिशे, ना रंजिशें, ना कश्मकश, ना ही ख़लिश,  मैं सोचता हूँ क्या कहीं ऐसा जहाँ भी होता है?  होता नहीं जिसमें […]

    बे-साख्ता

    ऐसा कोई आलम, कोई ऐसा जहाँ होता कभी,  ना बंदिशे, ना रंजिशें, ना कश्मकश, ना ही ख़लिश,  मैं सोचता हूँ क्या कहीं ऐसा जहाँ भी होता है?  होता नहीं जिसमें ज़लल, ना ही बुरी कोई रविश। मैं सोचता हूँ, गर्दिश-ए-अय्याम को हम भूलकर,  फिर,...

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    पीता नहीं मगर मुझे आदत अजीब है पीता नहीं मगर मुझे आदत अजीब है, कहता हूँ मैं जहाँ से मुहब्बत अजीब है।  जो रोग दिल को है लगा उसकी कहूँ मैं क्या, मैं क्या कहूँ ये दिल भी न हज़रत अजीब […]

    पीता नहीं मगर मुझे आदत अजीब है

    पीता नहीं मगर मुझे आदत अजीब है, कहता हूँ मैं जहाँ से मुहब्बत अजीब है।  जो रोग दिल को है लगा उसकी कहूँ मैं क्या, मैं क्या कहूँ ये दिल भी न हज़रत अजीब है।  शम’-ए-हयात बुझ चुकी जलता रहा खुलूस, जलते जहाँ में...

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