तुम चले गए तो चले गए
तुम चने गए तो चने गाए, अब कोई दूला धर्म जन्म नहीं, अब कोई दूजा रूप नहीं, अब कोई दूजा धर्म नहीं ।
We have learnt a lot about Literature. Now, let’s give it a try.
These are My Words in the forms of Kavita(poems), Kahaniyan(stories), Ghazalein, Nazmein etc.
तुम चने गए तो चने गाए, अब कोई दूला धर्म जन्म नहीं, अब कोई दूजा रूप नहीं, अब कोई दूजा धर्म नहीं ।
आज सुबह अख़बार पढ़ते-पढ़ते मैंने गौर किया कि इस देश का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, और उससे भी बुरी बात यह जानी कि इसे इस बारे में मालूम भी नहीं है।
तन-मन एक हुए सब ही अब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।
सजल विलोचन आज हुए सब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।।
हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे,
ख़ूबियाँ कैसी हैं देखो तो सितमगर में मिरे।
था न-जाने कब से इक कतरा लहू का आँख में,
आज टपका तो दिखा क्या था तसव्वुर में मिरे।
तीर रहने दो जिगर में क्यों निकालें हम इसे,
इक यही तो याद दिलबर की रही घर में मिरे।
क्या करूँ ग़म जो मुझे अब बे-मुरव्वत कह दिया,
रोज़ क़िस्से लाख उड़ते हैं जहाँ भर में मिरे।
जानता हूँ मैं बड़ी खलती तुम्हें ख़ल्वत मगर,
है नहीं कोई दरीचा, और दर, घर में मिरे।
देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं,
रस्ते सभी हैं एक से तो क्या ही करूँ मैं।
मुझको मिला है एक सफ़र में नया रहबर,
दिखला रहा रस्ता कि जिसे पा न सकूँ मैं।
पिन्दार मिरे और बड़ा, और बड़ा हो,
तुझको ही मिले जो मिले, तुझसे ही मिलूँ मैं।
मुझको याद है, ये सौंधी-सौंधी ख़ुश्बू,
दरख़्तों की ये छाँव, ये बारिश के पछाटे,
ये झूमती गाती फ़सलें, ये टूटे से वीराने,
और छोटी सी ये जन्नत,
जिसमें रहती थी वो बुढ़िया,
कि, जिसके हाथों को छू लूँ,
तो आता था वो हौसला मुझे,
की इक रोज़ छू लूँगा ये दुनिया।
पर आज जो लौटा इस शहर,
तो देखता हूँ न-जाने क्यूँ,
ये सिर है झुका हुआ,
ये कंधे थक चुके हैं।
मैं इसी विचार में निमग्न सोचती रही, कि,
बोल दूँ दबी हुई, पुकार लूँ तुम्हें अभी।
किंतु ये न हो सका, मिला मुझे यही वियोग,
और यूँ दबे रहे अपूर्ण स्वप्न वो सभी।।
इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है,इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है।
हर दम के साथ लबों से इक आह निकलती है,
आँखें नम कैसे हैं, सासें क्यों जलती हैं।
करता हूँ मैं तलाश ज़र्रा-ज़र्रा अपना,
रोज़ नई कोई ख़ामी मुझमें निकलती है।
कहता है फाज़िल मय को चीज़ बुरी या रब,
जाने कैसे शामें उसकी गुज़रा करती हैं।
क़ायल नहीं ख़ुदा के फैसलों का मैं भी पर,
हूँ जानता मैं भी दुनिया कैसे चलती है।
ना छेड़ ‘क़लम’ मेरी साज़-ए-हस्ती को यूँ,
जाँ फिर कहाँ संभले जो एक बार बिखरती है।
ऐसा कोई आलम, कोई ऐसा जहाँ होता कभी,
ना बंदिशे, ना रंजिशें, ना कश्मकश, ना ही ख़लिश,
मैं सोचता हूँ क्या कहीं ऐसा जहाँ भी होता है?
होता नहीं जिसमें ज़लल, ना ही बुरी कोई रविश।
मैं सोचता हूँ, गर्दिश-ए-आयाम को हम भूलकर,
फिर, इब्तिदा करते किसी ऐसे जहाँ में, इश्क की,
जिसमें छलकती आरज़ू, जिसमें खटकता इज़्तिराब,
जिसमें विसाल-ए-यार हो, जिसमें उरूज-ए-खल्क हो,
जिसमें नहीं कुछ कश्मकश, जिसमें नहीं कुछ जुस्तुजू,
बे-गैरती ना हो जहाँ, कुछ ‘आरज़ी ना हो जहाँ,
ये मस’अले ना हो जहाँ, ये हसरतें ना हो जहाँ ।
मैं सोचता हूँ, हो कोई ऐसा जहाँ बे-साख्ता,
मैं सोचता हूँ, है कोई ऐसा जहाँ बे-साख्ता?