'इक बार कहो तुम मेरी हो' इब्न-ए-इंशा द्वारा रचित एक बेहद खूबसूरत नज़्म है। जिसे क़लमकश अर्थात् मैंने आवाज़ देकर आज आपके समक्ष रखा है।


हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे, ख़ूबियाँ कैसी हैं देखो तो सितमगर में मिरे। था न-जाने कब से इक कतरा लहू का आँख में, आज टपका तो दिखा क्या था तसव्वुर में मिरे। तीर रहने दो जिगर में क्यों निकालें हम इसे, इक यही तो याद दिलबर की रही घर में मिरे। क्या करूँ ग़म जो मुझे अब बे-मुरव्वत कह दिया, रोज़ क़िस्से लाख उड़ते हैं जहाँ भर में मिरे। जानता हूँ मैं बड़ी खलती तुम्हें ख़ल्वत मगर, है नहीं कोई दरीचा, और दर, घर में मिरे।

कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे, कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे। ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री, ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे।

याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत से मुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलते ख़त्म हो जाए जो दो चार क़दम और चलो मोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी का जिस से आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम हो साँस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दम तुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखो गरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका है गर कहीं तुम से हम-आग़ोश हुई फिर से नज़र फूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़र फिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहम साया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र दूसरी बात भी झूटी है कि दिल जानता है याँ कोई मोड़ कोई दश्त कोई घात नहीं जिस के पर्दे में मिरा माह-ए-रवाँ डूब सके तुम से चलती रहे ये राह, यूँही अच्छा है तुम ने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं




