तुम चने गए तो चने गाए, अब कोई दूला धर्म जन्म नहीं, अब कोई दूजा रूप नहीं, अब कोई दूजा धर्म नहीं ।

आज सुबह अख़बार पढ़ते-पढ़ते मैंने गौर किया कि इस देश का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, और उससे भी बुरी बात यह जानी कि इसे इस बारे में मालूम भी नहीं है।

'इक बार कहो तुम मेरी हो' इब्न-ए-इंशा द्वारा रचित एक बेहद खूबसूरत नज़्म है। जिसे क़लमकश अर्थात् मैंने आवाज़ देकर आज आपके समक्ष रखा है।


हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे, ख़ूबियाँ कैसी हैं देखो तो सितमगर में मिरे। था न-जाने कब से इक कतरा लहू का आँख में, आज टपका तो दिखा क्या था तसव्वुर में मिरे। तीर रहने दो जिगर में क्यों निकालें हम इसे, इक यही तो याद दिलबर की रही घर में मिरे। क्या करूँ ग़म जो मुझे अब बे-मुरव्वत कह दिया, रोज़ क़िस्से लाख उड़ते हैं जहाँ भर में मिरे। जानता हूँ मैं बड़ी खलती तुम्हें ख़ल्वत मगर, है नहीं कोई दरीचा, और दर, घर में मिरे।
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