देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं

देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं,

रस्ते सभी हैं एक से तो क्या ही करूँ मैं।

मुझको मिला है एक सफ़र में नया रहबर,

दिखला रहा रस्ता कि जिसे पा न सकूँ मैं।

पिन्दार मिरे और बड़ा, और बड़ा हो,

तुझको ही मिले जो मिले, तुझसे ही मिलूँ मैं।

थकन

मुझको याद है, ये सौंधी-सौंधी ख़ुश्बू,

दरख़्तों की ये छाँव, ये बारिश के पछाटे,

ये झूमती गाती फ़सलें, ये टूटे से वीराने,

और छोटी सी ये जन्नत,

जिसमें रहती थी वो बुढ़िया,

कि, जिसके हाथों को छू लूँ,

तो आता था वो हौसला मुझे,

की इक रोज़ छू लूँगा ये दुनिया।

पर आज जो लौटा इस शहर,

तो देखता हूँ न-जाने क्यूँ,

ये सिर है झुका हुआ,

ये कंधे थक चुके हैं।