आज सुबह अख़बार पढ़ते-पढ़ते मैंने गौर किया कि इस देश का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, और उससे भी बुरी बात यह जानी कि इसे इस बारे में मालूम भी नहीं है। यह देश सोचता है कि मैं शारीरिक, मानसिक और सामाजिक—तीनों तौर पर बिल्कुल स्वस्थ हूँ, जबकि ऐसा है नहीं।

यह देश बीमार है

आज सुबह अख़बार पढ़ते-पढ़ते मैंने गौर किया कि इस देश का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, और उससे भी बुरी बात यह जानी कि इसे इस बारे में मालूम भी नहीं है। यह देश सोचता है कि मैं शारीरिक, मानसिक और सामाजिक—तीनों तौर पर बिल्कुल स्वस्थ हूँ, जबकि ऐसा है नहीं।


अगर सही तौर पर देखा जाए तो इस देश जैसी बीमारी शायद और कहीं न मिले—ऐसी विचित्र बीमारियाँ, जिनके नाम ही बड़े दिलचस्प हैं; उदाहरणतः: ऊँच-नीच, जाति-कुल, धर्म-मज़हब, न्याय-अन्याय आदि-आदि।


ये ऐसी बीमारियाँ हैं, जिन्हें बढ़ावा देने वाले अनेक कारक हैं, जैसे राजनीति, जो इन सभी बीमारियों को और ज़्यादा घातक बनाती है। राजनीति न हो तो मीडिया, मीडिया न हो तो मानसिकता—छुआछूत, घृणा, और घृणा के साथ ही यह सोच कि मेरा धर्म, कुल, मज़हब, जाति, बिरादरी, सोच-समझ दूसरों के मुक़ाबले बहुत बड़ी है; मैं सबसे ऊँचा हूँ।


क्यों? क्योंकि मेरे पूर्वज महान थे। क्यों? क्योंकि उन्होंने अनगिनत युद्ध जीते, अंग्रेज़ों से आज़ादी दिलवाई, वगैरह-वगैरह।


और यदि पूछा जाए कि क्या आपको एक भी युद्ध का नाम पता है, जो आपके पूर्वजों ने जीता, या कोई आंदोलन जिसमें आपके पूर्वजों ने प्रतिभाग किया—तो कोई उत्तर नहीं मिलता। और पूरी कोशिश यह की जाती है कि बात पलट दी जाए या घुमा-फिराकर बात को झगड़ों में बदल दिया जाए।

फिर दी जाती हैं गालियाँ—एक-दूसरे के उन्हीं पूर्वजों को, जिन्होंने साथ मिलकर युद्धों में भाग लिया, अंग्रेज़ों को भगाया, स्वतंत्रता का झंडा फहराया और सैकड़ों ऐसे काम किए, जिससे यह देश आज भी जीवित है।
हालाँकि बीमार है, परंतु जीवित तो है।


और एक मज़े की बात यह भी है कि इनमें कई लोगों को तो केवल यही लगता है कि उन्हें सारा ज्ञान है, और वे जो बोल रहे हैं, वही सही और सत्य है। परंतु इनमें से कुछ लोग तो सीना ठोककर झूठ बोलते हैं। पूरे आत्मविश्वास के साथ ये इतनी तुच्छ और गिरी हुई बातें करते हैं कि इनकी विकृत मानसिकता का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं होता।


खैर, मैं शायद विषय से थोड़ा भटक गया—बात को गलत करने वालों से हटाकर उन्हें सराहने वालों, उन्हें बचाने वालों पर ले आया।


हालाँकि ये बचाने वाले—इनके रक्षक—देश के लिए और भी बड़ा ख़तरा हैं। इनके सामने यदि घिनौने से घिनौना अपराध भी हो जाए, तब भी ये लोग सबसे पहले एक ही मुद्दा उठाते हैं—“धर्म”।


बलात्कार, हत्या, हिंसा से लेकर हर छोटे से छोटे अपराध पर सबसे पहले यही पूछा जाता है—“धर्म/मज़हब क्या था?”


और यदि इन्हीं के धर्म/मज़हब का अपराधी निकल आए, तो ये यह कहने की बजाय कि “न्याय सबके लिए बराबर है” या “कड़ी से कड़ी सज़ा होनी चाहिए”—या जो भी ये दूसरे मज़हब वालों के लिए कहते हैं—ये कहते हैं कि “जब उस मज़हब/धर्म/जाति/बिरादरी के लोग करते हैं, तब तो कोई नहीं आता,” या “केवल हमें ही निशाना बनाया जा रहा है।”


मामला कितना ही गंभीर क्यों न हो, इनके अनुसार बात इनके मज़हब/धर्म/जाति पर नहीं आनी चाहिए। यदि ऐसा हुआ, तो पूरी क़ौम उठ खड़ी होगी।
मुझे समझ नहीं आता कि ये लोग एक ऐसी चीज़ को लेकर जी कैसे रहे हैं, जो इनके ऊपर बचपन में ही थोप दी गई। जीना तो छोड़िए, ये लोग तो ऐसी चीज़ के लिए लड़ रहे हैं; उस धर्म/मज़हब/जाति/बिरादरी पर गर्व कर रहे हैं, जिसके बारे में इन्हें कोई वास्तविक ज्ञान ही नहीं।


यह नई पीढ़ी तिलक लगाकर धार्मिक नहीं हुई है—यह तो इनके लिए एक नया फैशन है। तिलक लगाकर, टोपी पहनकर, गले में क्रॉस लटकाकर ये इसलिए नहीं घूमते कि यह धर्म में या किताबों में लिखा है; बल्कि इसलिए करते हैं ताकि हर कोई दूर से ही देखकर पहचान जाए—कि यह हिंदू है, यह कट्टर मुसलमान है, यह क्रिश्चियन है।


धर्म आजकल धर्म नहीं रहा—फैशन है, ट्रेंड है।


यह अच्छी बात भी है और बुरी भी—कि आज का युवा अपनी जड़ों की तरफ़ जा रहा है। अच्छी इस प्रकार कि शायद इससे वे अपनी संस्कृति से वापस जुड़ें; और बुरी इस प्रकार कि यदि ये संस्कृति की ओर नहीं मुड़े, तो यही धर्म इनके पतन का सबसे बड़ा कारण बनेगा।


खैर, मेरे जैसे अनगिनत लोग यहाँ बैठे हैं, जो मेरी ही तरह इन बीमारियों का इलाज ढूँढ रहे हैं, जो जागरूकता फैलाना चाहते हैं। शायद हमारे बोलने से कुछ भी न हो—पर फिर भी हम बोलेंगे, क्योंकि यह देश बीमार है और हम इसका उपचार करके रहेंगे।