थकन

मुझको याद है, ये सौंधी-सौंधी ख़ुश्बू,

दरख़्तों की ये छाँव, ये बारिश के पछाटे,

ये झूमती गाती फ़सलें, ये टूटे से वीराने,

और छोटी सी ये जन्नत,

जिसमें रहती थी वो बुढ़िया,

कि, जिसके हाथों को छू लूँ,

तो आता था वो हौसला मुझे,

की इक रोज़ छू लूँगा ये दुनिया।

पर आज जो लौटा इस शहर,

तो देखता हूँ न-जाने क्यूँ,

ये सिर है झुका हुआ,

ये कंधे थक चुके हैं।

बे-साख्ता

ऐसा कोई आलम, कोई ऐसा जहाँ होता कभी,
ना बंदिशे, ना रंजिशें, ना कश्मकश, ना ही ख़लिश,
मैं सोचता हूँ क्या कहीं ऐसा जहाँ भी होता है?
होता नहीं जिसमें ज़लल, ना ही बुरी कोई रविश।

मैं सोचता हूँ, गर्दिश-ए-आयाम को हम भूलकर,
फिर, इब्तिदा करते किसी ऐसे जहाँ में, इश्क की,
जिसमें छलकती आरज़ू, जिसमें खटकता इज़्तिराब,
जिसमें विसाल-ए-यार हो, जिसमें उरूज-ए-खल्क हो,
जिसमें नहीं कुछ कश्मकश, जिसमें नहीं कुछ जुस्तुजू,
बे-गैरती ना हो जहाँ, कुछ ‘आरज़ी ना हो जहाँ,
ये मस’अले ना हो जहाँ, ये हसरतें ना हो जहाँ ।

मैं सोचता हूँ, हो कोई ऐसा जहाँ बे-साख्ता,
मैं सोचता हूँ, है कोई ऐसा जहाँ बे-साख्ता?

परिंदे

परिंदे उड़ा नहीं करते आज-कल, यूँ ही घोंसलों में मुन्तज़िर बैठे रहते हैं, तकते रहते हैं इक राह, कि कब, कोई, आये जिसके सहारे से ज़िन्दगी शुरू हो..

तज़्किरे

तज़्किरे- महक रही हैं ये सबायें, खिल उठे है गुंचे फिर,मचल रहा है फिर चमन, मचल रही हैं इशरतें,बहार बन के आयी हैं निशात ज़िन्दगी में फिर…

बला

बला-ए-अज़ीम दो आँखें,उन आँखों में खुमारी,उस खुमारी में इश्क़,उस इश्क़ में दर्द,उस दर्द में यादें,उन यादों में मंज़र…

तन्हाई

कौन है वो जिससे पिछली शाम मिले, क्या कोई अनजान शख्स? या तुम्हारी तन्हाई? “तन्हाई” is an Urdu Nazm beautifully composed by Kalamkash.

पहलू

बहका-बहका मन, तन्हा दिल, उदास तन,ज़िन्दगी का इक पहलू ये भी है, कहते हैं बहुत से पहलू हैं इस ज़िन्दगी के,  देखो तो हज़ारों चेहरे हैं…

शहर

“ये शहर की चकाचौंध आँखों में बड़ी खलती है,ये शहर शायद खा रहा है मुझे।” ‘शहर’ is a very beautiful Nazm written by Kalamkash.