पीता नहीं मगर मुझे आदत अजीब है
पीता नहीं मगर मुझे आदत अजीब है,
कहता हूँ मैं जहाँ से मुहब्बत अजीब है।
जो रोग दिल को है लगा उसकी कहूँ मैं क्या,
मैं क्या कहूँ ये दिल भी न हज़रत अजीब है।
We have learnt a lot about Literature. Now, let’s give it a try.
These are My Words in the forms of Kavita(poems), Kahaniyan(stories), Ghazalein, Nazmein etc.
पीता नहीं मगर मुझे आदत अजीब है,
कहता हूँ मैं जहाँ से मुहब्बत अजीब है।
जो रोग दिल को है लगा उसकी कहूँ मैं क्या,
मैं क्या कहूँ ये दिल भी न हज़रत अजीब है।
जानिब-ए-’अदम को मैं बढ़ चला जहाँ को छोड़,
और सोचता हूँ मैं हूँ कहाँ जहाँ को छोड़।
जो गुजरने वाले थे वो गुज़र गए जानाँ,
वो तराना मिटटी में मिल गया जहाँ को छोड़।
है शिकस्त अपनी उलफ़त की मैं कहूँ तो क्या,
छोड़ आया था मैं अपना गुमाँ, जहाँ को छोड़।
अब ज़वाल का अपने मैं मु’आइना कर लूँ,
ग़म-गुसार, हमको क्या ना मिला जहाँ को छोड़।
परिंदे उड़ा नहीं करते आज-कल, यूँ ही घोंसलों में मुन्तज़िर बैठे रहते हैं, तकते रहते हैं इक राह, कि कब, कोई, आये जिसके सहारे से ज़िन्दगी शुरू हो..
हमें आप फिरसे बुला लीजे जानाँ,
करे फैसले क्या, बता दीजे जानाँ।
है तारीक अब भी भला क्यूँ ये कमरा,
ज़रा इसमें दीये जला दीजे जानाँ।
फिर एक आम सी बात पर होगा झगड़ा,
सो, सारे तअल्लुक भुला दीजे जानाँ।
मुझे है ग़म-ए-ज़ीस्त से खौफ़ सा कुछ,
मुझे आप इससे बचा लीजे जानाँ।
तरावत जो दीदों में है, आप उससे,
ये तरतीब फिरसे सजा लीजे जानाँ।
ये जो रम्ज़ है आपकी नज़रों में ना,
आप इसे सबसे छुपा लीजे जानाँ।
गुज़रने लगा हूँ मैं अपनी हदों से,
ज़रा मुझपे तोहमत लगा दीजे जानाँ।
-क़लमकश
नत- मस्तक हो वंदन करता हूँ उसको,
वह गरल कि जो हृदय में है फलता ।
कालजयी भी जिसे, शत-शत शीश नवाए,
वह, सदा जो अहंकार – मद में पलता ।
राम चलो वनवास चलें,
लोग तुम्हें अब ना भजते।
रीत यहाँ कि नहीं अब वो,
छोड़ गये तुम थे तब जो।।
एसी कहाँ किस्मत कि नसीबों में शिफा हो,
राहत जो नहीं रोग से गर फिर तो कज़ा हो।
मैं जानता हूँ ये जो शब-ए-ग़म की कसक है,
है चाह तुझे भी ज़रा ये दर्द पता हो।
है हर इक ख्वाब वाबस्ता उसी से,
मुहब्बत है शुरू होती यहीं से।
तबीयत आज कुछ अच्छी नहीं है,
है शायद हाल ये तेरी कमी से।
रंज-ओ-सितम से दूर फिरसे इश्क की हो इब्तिदा,
कोई ख़लिश ना हो जहाँ, कोई ख़लल ना हो जहाँ,
सब रंजिशों से दूर हों, सब बंदिशों से दूर हों,
कोई कशिश ना हो जहाँ, कोई जदल ना हो जहाँ।
तज़्किरे- महक रही हैं ये सबायें, खिल उठे है गुंचे फिर,मचल रहा है फिर चमन, मचल रही हैं इशरतें,बहार बन के आयी हैं निशात ज़िन्दगी में फिर…