गुलज़ार: कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे
कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे,
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे।
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री,
ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे।
कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे,
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे।
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री,
ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे।
मुझको याद है, ये सौंधी-सौंधी ख़ुश्बू,
दरख़्तों की ये छाँव, ये बारिश के पछाटे,
ये झूमती गाती फ़सलें, ये टूटे से वीराने,
और छोटी सी ये जन्नत,
जिसमें रहती थी वो बुढ़िया,
कि, जिसके हाथों को छू लूँ,
तो आता था वो हौसला मुझे,
की इक रोज़ छू लूँगा ये दुनिया।
पर आज जो लौटा इस शहर,
तो देखता हूँ न-जाने क्यूँ,
ये सिर है झुका हुआ,
ये कंधे थक चुके हैं।