तेरा नाम नहीं
तेरे पैरों चला नहीं जो धूप छाँव में ढला नहीं जो वह तेरा सच कैसे, जिस पर तेरा नाम नहीं?
तेरे पैरों चला नहीं जो धूप छाँव में ढला नहीं जो वह तेरा सच कैसे, जिस पर तेरा नाम नहीं?
इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है,इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है।
हर दम के साथ लबों से इक आह निकलती है,
आँखें नम कैसे हैं, सासें क्यों जलती हैं।
करता हूँ मैं तलाश ज़र्रा-ज़र्रा अपना,
रोज़ नई कोई ख़ामी मुझमें निकलती है।
कहता है फाज़िल मय को चीज़ बुरी या रब,
जाने कैसे शामें उसकी गुज़रा करती हैं।
क़ायल नहीं ख़ुदा के फैसलों का मैं भी पर,
हूँ जानता मैं भी दुनिया कैसे चलती है।
ना छेड़ ‘क़लम’ मेरी साज़-ए-हस्ती को यूँ,
जाँ फिर कहाँ संभले जो एक बार बिखरती है।
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आज हिंदी दिवस है और हिंदी दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है।
नत- मस्तक हो वंदन करता हूँ उसको,
वह गरल कि जो हृदय में है फलता ।
कालजयी भी जिसे, शत-शत शीश नवाए,
वह, सदा जो अहंकार – मद में पलता ।
राम चलो वनवास चलें,
लोग तुम्हें अब ना भजते।
रीत यहाँ कि नहीं अब वो,
छोड़ गये तुम थे तब जो।।
दोहे हिंदी काव्य में सबसे प्रचलित छंदों में से एक है। हालांकि नए कवियों के आने के बाद दोहों का उतना प्रचलन नहीं रहा।
सुबह से यह कुत्ता इसी गली के चक्कर काट रहा है। कोई मूर्ख गाड़ी चढ़ा गया है, तबसे बेचारा यूँ ही रोता हुआ घूम रहा है।
दिल-ए-मुज़्तर, दिल-ए-नाशाद, ये नाराज़गी कैसी,
न रंज हो, ना सितम, ना ठोकरें तो ज़िंदगी कैसी।
तू मुझमें आज भी बाकी है is a very beautiful Urdu Nazm composed by Kalamkash. Which describes the core of a broken lover’s heart.