भजन

तन-मन एक हुए सब ही अब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।
सजल विलोचन आज हुए सब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।।

ग़ज़ल: हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे

हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे,
ख़ूबियाँ कैसी हैं देखो तो सितमगर में मिरे।

था न-जाने कब से इक कतरा लहू का आँख में,
आज टपका तो दिखा क्या था तसव्वुर में मिरे।

तीर रहने दो जिगर में क्यों निकालें हम इसे,
इक यही तो याद दिलबर की रही घर में मिरे।

क्या करूँ ग़म जो मुझे अब बे-मुरव्वत कह दिया,
रोज़ क़िस्से लाख उड़ते हैं जहाँ भर में मिरे।

जानता हूँ मैं बड़ी खलती तुम्हें ख़ल्वत मगर,
है नहीं कोई दरीचा, और दर, घर में मिरे।

अपूर्ण

मैं इसी विचार में निमग्न सोचती रही, कि,

बोल दूँ दबी हुई, पुकार लूँ तुम्हें अभी।

किंतु ये न हो सका, मिला मुझे यही वियोग,

और यूँ दबे रहे अपूर्ण स्वप्न वो सभी।।

निर्झर

शत-शत बाधा-बंधन तोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
प्लावित कर पृथ्वी के पर्त्त,
समतल कर बहु गह्वर गर्त्त,
दिखला कर आवर्त्त-विवर्त्त,
आता हूँ आलोड़ विलोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।

हर दम के साथ लबों से इक आह निकलती है

हर दम के साथ लबों से इक आह निकलती है,
आँखें नम कैसे हैं, सासें क्यों जलती हैं।

करता हूँ मैं तलाश ज़र्रा-ज़र्रा अपना,
रोज़ नई कोई ख़ामी मुझमें निकलती है।

कहता है फाज़िल मय को चीज़ बुरी या रब,
जाने कैसे शामें उसकी गुज़रा करती हैं।

क़ायल नहीं ख़ुदा के फैसलों का मैं भी पर,
हूँ जानता मैं भी दुनिया कैसे चलती है।

ना छेड़ ‘क़लम’ मेरी साज़-ए-हस्ती को यूँ,
जाँ फिर कहाँ संभले जो एक बार बिखरती है।

हिंदी

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि आज हिंदी दिवस है और हिंदी दुनिया में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है।

गरल

नत- मस्तक हो वंदन करता हूँ उसको,
वह गरल कि जो हृद‌य में है फलता ।
कालजयी भी जिसे, शत-शत शीश नवाए,
वह, सदा जो अहंकार – मद में पलता ।