गुलज़ार: कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे
कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे,
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे।
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री,
ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे।
कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे,
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे।
ख़फ़ा थी शाख़ से शायद कि जब हवा गुज़री,
ज़मीं पे गिरते हुए फूल बे-शुमार दिखे।
“ये शहर की चकाचौंध आँखों में बड़ी खलती है,ये शहर शायद खा रहा है मुझे।” ‘शहर’ is a very beautiful Nazm written by Kalamkash.