भजन
तन-मन एक हुए सब ही अब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।
सजल विलोचन आज हुए सब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।।
तन-मन एक हुए सब ही अब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।
सजल विलोचन आज हुए सब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।।
हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे,
ख़ूबियाँ कैसी हैं देखो तो सितमगर में मिरे।
था न-जाने कब से इक कतरा लहू का आँख में,
आज टपका तो दिखा क्या था तसव्वुर में मिरे।
तीर रहने दो जिगर में क्यों निकालें हम इसे,
इक यही तो याद दिलबर की रही घर में मिरे।
क्या करूँ ग़म जो मुझे अब बे-मुरव्वत कह दिया,
रोज़ क़िस्से लाख उड़ते हैं जहाँ भर में मिरे।
जानता हूँ मैं बड़ी खलती तुम्हें ख़ल्वत मगर,
है नहीं कोई दरीचा, और दर, घर में मिरे।
मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए? शहर के दूर के तनाव दबाव कोई सह भी ले, पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव सहा कैसे…
देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं,
रस्ते सभी हैं एक से तो क्या ही करूँ मैं।
मुझको मिला है एक सफ़र में नया रहबर,
दिखला रहा रस्ता कि जिसे पा न सकूँ मैं।
पिन्दार मिरे और बड़ा, और बड़ा हो,
तुझको ही मिले जो मिले, तुझसे ही मिलूँ मैं।
मुझको याद है, ये सौंधी-सौंधी ख़ुश्बू,
दरख़्तों की ये छाँव, ये बारिश के पछाटे,
ये झूमती गाती फ़सलें, ये टूटे से वीराने,
और छोटी सी ये जन्नत,
जिसमें रहती थी वो बुढ़िया,
कि, जिसके हाथों को छू लूँ,
तो आता था वो हौसला मुझे,
की इक रोज़ छू लूँगा ये दुनिया।
पर आज जो लौटा इस शहर,
तो देखता हूँ न-जाने क्यूँ,
ये सिर है झुका हुआ,
ये कंधे थक चुके हैं।
अगर तुम दिल हमारा ले के पछताए तो रहने दो, न काम आए तो वापस दो जो काम आए तो…
शत-शत बाधा-बंधन तोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
प्लावित कर पृथ्वी के पर्त्त,
समतल कर बहु गह्वर गर्त्त,
दिखला कर आवर्त्त-विवर्त्त,
आता हूँ आलोड़ विलोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
तेरे पैरों चला नहीं जो धूप छाँव में ढला नहीं जो वह तेरा सच कैसे, जिस पर तेरा नाम नहीं?
मिरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे
ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे
नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं
ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे
इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है,इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है।