तुम चले गए तो चले गए
तुम चने गए तो चने गाए, अब कोई दूला धर्म जन्म नहीं, अब कोई दूजा रूप नहीं, अब कोई दूजा धर्म नहीं ।
तुम चने गए तो चने गाए, अब कोई दूला धर्म जन्म नहीं, अब कोई दूजा रूप नहीं, अब कोई दूजा धर्म नहीं ।
हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे,
ख़ूबियाँ कैसी हैं देखो तो सितमगर में मिरे।
था न-जाने कब से इक कतरा लहू का आँख में,
आज टपका तो दिखा क्या था तसव्वुर में मिरे।
तीर रहने दो जिगर में क्यों निकालें हम इसे,
इक यही तो याद दिलबर की रही घर में मिरे।
क्या करूँ ग़म जो मुझे अब बे-मुरव्वत कह दिया,
रोज़ क़िस्से लाख उड़ते हैं जहाँ भर में मिरे।
जानता हूँ मैं बड़ी खलती तुम्हें ख़ल्वत मगर,
है नहीं कोई दरीचा, और दर, घर में मिरे।
मैं इसी विचार में निमग्न सोचती रही, कि,
बोल दूँ दबी हुई, पुकार लूँ तुम्हें अभी।
किंतु ये न हो सका, मिला मुझे यही वियोग,
और यूँ दबे रहे अपूर्ण स्वप्न वो सभी।।
हिन्दी (Hindi) is an essay written on the occasion of Hindi Diwas. To show the importance of our language and culture to the new generation.