देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं

देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं,

रस्ते सभी हैं एक से तो क्या ही करूँ मैं।

मुझको मिला है एक सफ़र में नया रहबर,

दिखला रहा रस्ता कि जिसे पा न सकूँ मैं।

पिन्दार मिरे और बड़ा, और बड़ा हो,

तुझको ही मिले जो मिले, तुझसे ही मिलूँ मैं।

ऐ शहनशाह-ए-आस्माँ औरंग

ये क़िता “ऐ शहनशाह-ए-आस्माँ औरंग” आपने गुलज़ार साहब द्वारा रचित TV show या उनकी किताब “मिर्ज़ा ग़ालिब” में ज़रूर पढ़ा या सुना होगा जो ग़ालिब ने आखिरी मुग़ल बादशाह को अपने हालात का बखान करते हुए लिखा था। वैसे तो यह क़िता आप रेख़्ता पर उर्दू में पढ़ सकते हैं पर क्योंकि बहुत से लोगों को उर्दू पढ़नी नहीं आती है, इसलिए मैनें इसका देवनागरी में अनुवाद कर दिया। साथ ही कुछ कठिन शब्द हैं जिनका मतलब मैनें नीचे दे दिया है।