तुम चले गए तो चले गए
तुम चने गए तो चने गाए, अब कोई दूला धर्म जन्म नहीं, अब कोई दूजा रूप नहीं, अब कोई दूजा धर्म नहीं ।
तुम चने गए तो चने गाए, अब कोई दूला धर्म जन्म नहीं, अब कोई दूजा रूप नहीं, अब कोई दूजा धर्म नहीं ।
हर दम के साथ लबों से इक आह निकलती है,
आँखें नम कैसे हैं, सासें क्यों जलती हैं।
करता हूँ मैं तलाश ज़र्रा-ज़र्रा अपना,
रोज़ नई कोई ख़ामी मुझमें निकलती है।
कहता है फाज़िल मय को चीज़ बुरी या रब,
जाने कैसे शामें उसकी गुज़रा करती हैं।
क़ायल नहीं ख़ुदा के फैसलों का मैं भी पर,
हूँ जानता मैं भी दुनिया कैसे चलती है।
ना छेड़ ‘क़लम’ मेरी साज़-ए-हस्ती को यूँ,
जाँ फिर कहाँ संभले जो एक बार बिखरती है।
नत- मस्तक हो वंदन करता हूँ उसको,
वह गरल कि जो हृदय में है फलता ।
कालजयी भी जिसे, शत-शत शीश नवाए,
वह, सदा जो अहंकार – मद में पलता ।
तू मुझमें आज भी बाकी है is a very beautiful Urdu Nazm composed by Kalamkash. Which describes the core of a broken lover’s heart.
अंधेरा is a beautiful Nazm composed by Kalamkash, which tells us about the role of society in an incomplete love story.