इक बार कहो तुम मेरी हो
‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ इब्न-ए-इंशा द्वारा रचित एक बेहद खूबसूरत नज़्म है। जिसे क़लमकश अर्थात् मैंने आवाज़ देकर आज आपके समक्ष रखा है।
‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ इब्न-ए-इंशा द्वारा रचित एक बेहद खूबसूरत नज़्म है। जिसे क़लमकश अर्थात् मैंने आवाज़ देकर आज आपके समक्ष रखा है।
मुझको याद है, ये सौंधी-सौंधी ख़ुश्बू,
दरख़्तों की ये छाँव, ये बारिश के पछाटे,
ये झूमती गाती फ़सलें, ये टूटे से वीराने,
और छोटी सी ये जन्नत,
जिसमें रहती थी वो बुढ़िया,
कि, जिसके हाथों को छू लूँ,
तो आता था वो हौसला मुझे,
की इक रोज़ छू लूँगा ये दुनिया।
पर आज जो लौटा इस शहर,
तो देखता हूँ न-जाने क्यूँ,
ये सिर है झुका हुआ,
ये कंधे थक चुके हैं।