भजन

तन-मन एक हुए सब ही अब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।
सजल विलोचन आज हुए सब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।।

ग़ज़ल: हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे

हैं नहीं आँसू तलक भी अब मुक़द्दर में मिरे,
ख़ूबियाँ कैसी हैं देखो तो सितमगर में मिरे।

था न-जाने कब से इक कतरा लहू का आँख में,
आज टपका तो दिखा क्या था तसव्वुर में मिरे।

तीर रहने दो जिगर में क्यों निकालें हम इसे,
इक यही तो याद दिलबर की रही घर में मिरे।

क्या करूँ ग़म जो मुझे अब बे-मुरव्वत कह दिया,
रोज़ क़िस्से लाख उड़ते हैं जहाँ भर में मिरे।

जानता हूँ मैं बड़ी खलती तुम्हें ख़ल्वत मगर,
है नहीं कोई दरीचा, और दर, घर में मिरे।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़: कोई आशिक़ किसी महबूबा से

याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत से
मुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलते
ख़त्म हो जाए जो दो चार क़दम और चलो
मोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी का
जिस से आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम हो
साँस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दम
तुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखो
गरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका है
गर कहीं तुम से हम-आग़ोश हुई फिर से नज़र
फूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़र
फिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहम
साया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र

दूसरी बात भी झूटी है कि दिल जानता है
याँ कोई मोड़ कोई दश्त कोई घात नहीं
जिस के पर्दे में मिरा माह-ए-रवाँ डूब सके
तुम से चलती रहे ये राह, यूँही अच्छा है
तुम ने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं

देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं

देखूँ किसी भी ओर उसी ओर चलूँ मैं,

रस्ते सभी हैं एक से तो क्या ही करूँ मैं।

मुझको मिला है एक सफ़र में नया रहबर,

दिखला रहा रस्ता कि जिसे पा न सकूँ मैं।

पिन्दार मिरे और बड़ा, और बड़ा हो,

तुझको ही मिले जो मिले, तुझसे ही मिलूँ मैं।

थकन

मुझको याद है, ये सौंधी-सौंधी ख़ुश्बू,

दरख़्तों की ये छाँव, ये बारिश के पछाटे,

ये झूमती गाती फ़सलें, ये टूटे से वीराने,

और छोटी सी ये जन्नत,

जिसमें रहती थी वो बुढ़िया,

कि, जिसके हाथों को छू लूँ,

तो आता था वो हौसला मुझे,

की इक रोज़ छू लूँगा ये दुनिया।

पर आज जो लौटा इस शहर,

तो देखता हूँ न-जाने क्यूँ,

ये सिर है झुका हुआ,

ये कंधे थक चुके हैं।

मिरे दिल की राख कुरेद मत

मिरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे
ये चराग़ फिर भी चराग़ है कहीं तेरा हाथ जला न दे

नए दौर के नए ख़्वाब हैं नए मौसमों के गुलाब हैं
ये मोहब्बतों के चराग़ हैं इन्हें नफ़रतों की हवा न दे

हर दम के साथ लबों से इक आह निकलती है

हर दम के साथ लबों से इक आह निकलती है,
आँखें नम कैसे हैं, सासें क्यों जलती हैं।

करता हूँ मैं तलाश ज़र्रा-ज़र्रा अपना,
रोज़ नई कोई ख़ामी मुझमें निकलती है।

कहता है फाज़िल मय को चीज़ बुरी या रब,
जाने कैसे शामें उसकी गुज़रा करती हैं।

क़ायल नहीं ख़ुदा के फैसलों का मैं भी पर,
हूँ जानता मैं भी दुनिया कैसे चलती है।

ना छेड़ ‘क़लम’ मेरी साज़-ए-हस्ती को यूँ,
जाँ फिर कहाँ संभले जो एक बार बिखरती है।