इक बार कहो तुम मेरी हो
‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ इब्न-ए-इंशा द्वारा रचित एक बेहद खूबसूरत नज़्म है। जिसे क़लमकश अर्थात् मैंने आवाज़ देकर आज आपके समक्ष रखा है।
‘इक बार कहो तुम मेरी हो’ इब्न-ए-इंशा द्वारा रचित एक बेहद खूबसूरत नज़्म है। जिसे क़लमकश अर्थात् मैंने आवाज़ देकर आज आपके समक्ष रखा है।
याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत से
मुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलते
ख़त्म हो जाए जो दो चार क़दम और चलो
मोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी का
जिस से आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम हो
साँस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दम
तुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखो
गरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका है
गर कहीं तुम से हम-आग़ोश हुई फिर से नज़र
फूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़र
फिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहम
साया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र
दूसरी बात भी झूटी है कि दिल जानता है
याँ कोई मोड़ कोई दश्त कोई घात नहीं
जिस के पर्दे में मिरा माह-ए-रवाँ डूब सके
तुम से चलती रहे ये राह, यूँही अच्छा है
तुम ने मुड़ कर भी न देखा तो कोई बात नहीं
ऐसा कोई आलम, कोई ऐसा जहाँ होता कभी,
ना बंदिशे, ना रंजिशें, ना कश्मकश, ना ही ख़लिश,
मैं सोचता हूँ क्या कहीं ऐसा जहाँ भी होता है?
होता नहीं जिसमें ज़लल, ना ही बुरी कोई रविश।
मैं सोचता हूँ, गर्दिश-ए-आयाम को हम भूलकर,
फिर, इब्तिदा करते किसी ऐसे जहाँ में, इश्क की,
जिसमें छलकती आरज़ू, जिसमें खटकता इज़्तिराब,
जिसमें विसाल-ए-यार हो, जिसमें उरूज-ए-खल्क हो,
जिसमें नहीं कुछ कश्मकश, जिसमें नहीं कुछ जुस्तुजू,
बे-गैरती ना हो जहाँ, कुछ ‘आरज़ी ना हो जहाँ,
ये मस’अले ना हो जहाँ, ये हसरतें ना हो जहाँ ।
मैं सोचता हूँ, हो कोई ऐसा जहाँ बे-साख्ता,
मैं सोचता हूँ, है कोई ऐसा जहाँ बे-साख्ता?
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