इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है
इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है,इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है।
इन आँखों में रौशन रौशन कोई ख्वाब झलकता है,इन बातों में देखो जैसे कोई राज़ खटकता है।
जानिब-ए-’अदम को मैं बढ़ चला जहाँ को छोड़,
और सोचता हूँ मैं हूँ कहाँ जहाँ को छोड़।
जो गुजरने वाले थे वो गुज़र गए जानाँ,
वो तराना मिटटी में मिल गया जहाँ को छोड़।
है शिकस्त अपनी उलफ़त की मैं कहूँ तो क्या,
छोड़ आया था मैं अपना गुमाँ, जहाँ को छोड़।
अब ज़वाल का अपने मैं मु’आइना कर लूँ,
ग़म-गुसार, हमको क्या ना मिला जहाँ को छोड़।
एसी कहाँ किस्मत कि नसीबों में शिफा हो,
राहत जो नहीं रोग से गर फिर तो कज़ा हो।
मैं जानता हूँ ये जो शब-ए-ग़म की कसक है,
है चाह तुझे भी ज़रा ये दर्द पता हो।
जॉन एलिया साहब की नज़्मों/ग़ज़लों में कई बार एक ज़िक्र मिलता है फारिहा के नाम का। कहते हैं के फारिहा उनके तसव्वुर में जीने वाली उनकी वो माशूका थी जिसने उनकी शायरी में वो दर्द, वो कसक पैदा की। उसी फारिहा के नाम जॉन एलिया साहब की ये नज़्म भी है।
ब-नाम फारिहा –
तज़्किरे- महक रही हैं ये सबायें, खिल उठे है गुंचे फिर,मचल रहा है फिर चमन, मचल रही हैं इशरतें,बहार बन के आयी हैं निशात ज़िन्दगी में फिर…
तू मुझमें आज भी बाकी है is a very beautiful Urdu Nazm composed by Kalamkash. Which describes the core of a broken lover’s heart.
कौन है वो जिससे पिछली शाम मिले, क्या कोई अनजान शख्स? या तुम्हारी तन्हाई? “तन्हाई” is an Urdu Nazm beautifully composed by Kalamkash.
For the unpredictable paths of life, Kalamkash wrote a very beautiful ghazal named ‘कोई रोता है’ which is a must-read for all Urdu lovers.
परछाइयाँ (Parchhaiyan) is a very beautiful Nazm from Sahir Ludhianvi’s first book “Talkhiyan” published in 1958.
अंधेरा is a beautiful Nazm composed by Kalamkash, which tells us about the role of society in an incomplete love story.