भजन

तन-मन एक हुए सब ही अब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।
सजल विलोचन आज हुए सब,
कृष्ण तुम्हें भजते भजते।।

अपूर्ण

मैं इसी विचार में निमग्न सोचती रही, कि,

बोल दूँ दबी हुई, पुकार लूँ तुम्हें अभी।

किंतु ये न हो सका, मिला मुझे यही वियोग,

और यूँ दबे रहे अपूर्ण स्वप्न वो सभी।।

गरल

नत- मस्तक हो वंदन करता हूँ उसको,
वह गरल कि जो हृद‌य में है फलता ।
कालजयी भी जिसे, शत-शत शीश नवाए,
वह, सदा जो अहंकार – मद में पलता ।